उत्तराखण्ड

दुखद (मुंबई)आशा भोसले का निधन.फिल्म इंडस्ट्रीज में शोक की लहर ।।

आशा भोसले अब हमारे बीच नहीं रहीं। उनके निधन के साथ ही भारतीय पार्श्व गायन (Playback Singing) के उस स्वर्णिम युग का अंत हो गया है जिसने आधी सदी से ज्यादा समय तक दुनिया को मंत्रमुग्ध किया।

अंतिम समय और स्वास्थ्य
92 वर्षीय आशा ताई पिछले कुछ समय से बढ़ती उम्र संबंधी समस्याओं से जूझ रही थीं। कल शाम उन्हें सांस लेने में तकलीफ और घबराहट की शिकायत के बाद अस्पताल ले जाया गया था। डॉक्टरों की एक विशेष टीम उनके स्वास्थ्य की निगरानी कर रही थी, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन की खबर मिलते ही फिल्मी जगत, राजनीति और खेल जगत की हस्तियों ने शोक संवेदनाएं व्यक्त करना शुरू कर दिया है।

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सात दशकों का जादुई सफर
8 सितंबर, 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में जन्मी आशा भोसले ने मात्र 10 साल की उम्र से गायन की शुरुआत की थी। उन्होंने केवल हिंदी ही नहीं, बल्कि 20 से अधिक भारतीय और विदेशी भाषाओं में हजारों गाने गाए। उनके नाम संगीत के इतिहास में सबसे अधिक एकल रिकॉर्डिंग (Studio Recordings) करने का विश्व रिकॉर्ड दर्ज है। शास्त्रीय संगीत हो, गजल हो, पॉप हो या फिर चुलबुले कैबरे सॉन्ग—आशा जी ने हर विधा में अपनी आवाज का लोहा मनवाया। ‘इन आँखों की मस्ती के’, ‘दम मारो दम’, और ‘पिया तू अब तो आजा’ जैसे गीत आज भी हर पीढ़ी की जुबान पर हैं।

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सम्मान और पुरस्कार
आशा भोसले जी को उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण (2008) और सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार (2000) से नवाजा गया था।

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आशा भोसले मात्र एक गायिका नहीं थीं, बल्कि वे भारतीय फिल्म संगीत की बदलती तकनीक और शैलियों की गवाह थीं। ग्रामोफोन के दौर से शुरू होकर डिजिटल युग तक, उन्होंने अपनी आवाज को हर सांचे में ढाला। शास्त्रीय संगीत की बारीकियां हों या पॉप संगीत का जोश, उन्होंने हर जगह अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की।

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