हल्द्वानी, Uttarakhand city news Haldwani
हल्द्वानी के गौला पार क्षेत्र में एक प्रगतिशील किसान द्वारा केंचुआ आधारित जैविक पद्धति से खेती कर मिट्टी की सेहत सुधारने और फसल उत्पादन बढ़ाने का सफल प्रयोग किया जा रहा है। किसान नरेंद्र सिंह मेहरा ने स्थानीय संसाधनों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं का उपयोग करते हुए ऐसी विधि
पढें The Pioneer की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट
विकसित की है, जिससे खेत की उर्वरता बढ़ रही है, सिंचाई की जरूरत कम हो रही है और उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

मेहरा पिछले एक वर्ष से देसी गाय के गोबर में जैविक घोल मिलाकर प्राकृतिक रूप से केंचुओं का संवर्धन कर रहे हैं। इसके लिए वे लगभग 10 कुंतल गोबर को किसी छायादार स्थान पर शंकु आकार में एकत्र करते हैं। इस पर पूसा डीकंपोजर या जीवामृत का छिड़काव कर ढेर में लगातार नमी बनाए रखी जाती है। मानसून से लेकर अक्टूबर तक यह प्रक्रिया चलती रहती है, जिससे गोबर पूर्णतः अपघटित होकर केंचुओं के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर देता है।
नवंबर-दिसंबर तक इस ढेर में बड़ी संख्या में केंचुए स्वतः उत्पन्न हो जाते हैं। इन्हें सर्दियों के मौसम में नमी वाली जमीन में लगभग एक फीट गहराई पर दबा दिया जाता है। खेत के अंदर छोड़े गए केंचुए मिट्टी में सुरंगें बनाते हुए फसल अवशेष और जैविक पदार्थों को खाकर प्राकृतिक रूप से वर्मी-कास्ट (केंचुआ खाद) तैयार करते हैं, जो सीधे जड़ों तक पोषण पहुंचाती है।
कृषि विज्ञान के अनुसार केंचुए मिट्टी की भौतिक, रासायनिक और जैविक संरचना सुधारने में अहम भूमिका निभाते हैं। उनकी गतिविधियों से मिट्टी में सूक्ष्म छिद्र बनते हैं, जिससे वायु संचार और जलधारण क्षमता बढ़ती है। यही कारण है कि मेहरा के खेतों में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और पहले की तुलना में कम सिंचाई की जरूरत पड़ती है। साथ ही मिट्टी में उपलब्ध नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्व पौधों को अधिक आसानी से मिलने लगते हैं।
मेहरा बताते हैं कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग ने मिट्टी से केंचुओं को लगभग समाप्त कर दिया था, जिससे भूमि की प्राकृतिक उर्वरता घटती गई। उनका मानना है कि “केंचुआ किसान का मित्र और जमीन का डॉक्टर है, जो बिना किसी अतिरिक्त लागत के खेत को अंदर से उपजाऊ बनाता है।”
इस पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम लागत है। पारंपरिक वर्मीकम्पोस्ट इकाई बनाने में जहां फसल अवशेष, ढांचा और श्रम की जरूरत पड़ती है, वहीं इस प्राकृतिक विधि में खर्च लगभग 90 प्रतिशत तक कम हो जाता है। इसके साथ ही सिंचाई की संख्या घटने से जल संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है।
कृषि विशेषज्ञ इसे टिकाऊ और वैज्ञानिक दृष्टि से मजबूत पहल मानते हैं। उनका कहना है कि केंचुओं की वापसी से मिट्टी की जैव विविधता बढ़ती है, कार्बनिक पदार्थों का विघटन तेज होता है और लंबे समय में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाई जा सकती है।
गौला पार में शुरू हुआ यह प्रयोग अब आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बन रहा है। प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित यह मॉडल कम लागत, बेहतर उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण—तीनों लक्ष्यों को एक साथ साधने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।




