उत्तराखण्ड

बड़ी खबर (उत्तराखंड) हिमालयन ब्लैक बियर का व्यवहार बदला, ग्रामीण सुरक्षित नहीं जलवायु परिवर्तन सवालों के घेरे में. यहां भालू के हमले की 12 घटनाएं दर्ज ।।

पर्वतीय सीमांत क्षेत्रों में भालू के हमलों से दहशत शीतनिंद्रा का प्राकृतिक चक्र टूटा, उत्तरकाशी में 12 घटनाएँ दर्ज

हिमालयन ब्लैक बियर का व्यवहार बदला, ग्रामीण सुरक्षित नहीं जलवायु परिवर्तन सवालों के घेरे में

भालू का बदला स्वभाव — इंसान और मवेशी दोनों पर बढ़ रहा खतरा

संवाददाता ठाकुर सुरेंद्र पाल सिंह

उत्तरकाशी।


उत्तरकाशी के ऊपरी पर्वतीय सीमांत गांवों में इन दिनों भालू का नाम ही डर पैदा कर रहा है। अस्सीगंगा घाटी से भटवाड़ी ब्लॉक तक हिमालयन ब्लैक बियर की असामान्य गतिविधि ने जीवन की हर लय को प्रभावित कर दिया है। सामान्यत: अक्टूबर–नवंबर में ये भालू शीतनिंद्रा में चले जाते हैं, लेकिन इस वर्ष वे जंगलों में सक्रिय घूम रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार यह स्थिति नई है, अप्रत्याशित है और सबसे अधिक चिंताजनक इसलिए है कि इससे सीधे तौर पर मनुष्य और पशुधन दोनों जोखिम में हैं। पिछले दो–तीन वर्षों में इनकी संख्या और हरकतें जिस तेजी से बढ़ी हैं, वह पहाड़ के शांत जीवन के लिए खतरे का संकेत बन चुकी है।

बारसू, रैथल, मल्ला भटवाड़ी, क्यार्क, सैंज, किशनपुर, मानपुर और बोंगा भेलुडा जैसे गांवों में भालुओं की मौजूदगी अब रोज की बात मानी जा रही है। शाम होते ही लोग घरों में बंद होने को मजबूर हो जाते हैं। खेतों में देर तक काम करना, पशुओं को खुले में बांधना और रात में आवाजाही करना अब ग्रामीणों के लिए भारी जोखिम का विषय बन चुका है। भालू घरों और खलिहानों के आसपास तक पहुंचने लगे हैं, छानियों को तोड़ रहे हैं और मवेशियों पर हमला कर रहे हैं। फिलहाल तक 11 घटनाओं की पुष्टि हो चुकी है, पर ग्रामीणों का कहना है कि कई बार लोग डर के कारण शिकायत तक नहीं करते।

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पर्वतीय सीमांत क्षेत्र मानव–वन्यजीव संघर्ष के नए चरण में प्रवेश कर चुका है। पहले जहां भालू केवल जंगल की गहराइयों में ही दिखते थे, अब वे आबादी के बीच उतरने लगे हैं। शीतनिंद्रा का समय बीत गया, पर भालू सोये नहीं—यही इस चिंताजनक स्थिति का मूल है। प्रभागीय वनाधिकारी डीपी बलूनी बताते हैं कि इस वर्ष नियमित समय पर बर्फबारी नहीं हुई, तापमान अपने सामान्य स्तर से कम उतरा और मौसम में निरंतर उतार–चढ़ाव रहा। इसी बदलाव ने भालुओं के जैविक चक्र को अस्त-व्यस्त कर दिया है। सामान्य परिस्थिति में वे अक्टूबर से फरवरी तक सुरक्षित गुफाओं में रहकर शीतनिंद्रा लेते और इसी दौरान मादाएं बच्चों को जन्म भी देती हैं, लेकिन इस बार उनका पूरा व्यवहार चक्र टूटा हुआ दिख रहा है। भालू अधिक सक्रिय, अस्थिर और आक्रामक नजर आ रहे हैं। यह केवल एक जंगली प्रजाति का व्यवहार परिवर्तन नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन की प्रत्यक्ष चेतावनी भी है।

वन विभाग ने स्थिति को गंभीरता से लेते हुए संवेदनशील गांवों में सायरन, सोलर फेंसिंग और सीसीटीवी कैमरे लगाने की तैयारी शुरू कर दी है। वनकर्मियों की टीम रात के समय गश्त बढ़ा रही है और ग्रामीणों को समूह में ही जंगल जाने की सलाह दी जा रही है। पर सवाल यह है कि क्या इतना पर्याप्त होगा? क्या भालू की इस बदली हुई प्रकृति से निपटने के लिए सिर्फ निगरानी व्यवस्था ही समाधान है? या फिर नीति स्तर पर ऐसी योजना बननी होगी जिसमें ग्रामीणों की सुरक्षा, पशुधन संरक्षण, चारागाह मार्गों की सुरक्षा और वन विभाग की त्वरित कार्रवाई शामिल हो।

क्यार्क में भालू द्वारा तीन छानियाँ तोड़कर मवेशियों पर हमला करने की ताज़ा घटना ने स्थिति की भयावहता को और गहरा कर दिया। नटीन गांव में भरत देवी पर हुए हमले के बाद उनकी हालत गंभीर बनी, और उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भटवाड़ी में भर्ती कराया गया। ग्रामीण कहते हैं कि अब वे रात को सोते समय भी दरवाजे बंद नहीं, बल्कि दिल में डर बांधकर सोते हैं। खेत–खलिहान अब केवल आजीविका का आधार नहीं, बल्कि खतरे का क्षेत्र भी बनते जा रहे हैं।

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उत्तरकाशी के पहाड़ बदल रहे हैं नदियों की धारा की तरह, वनस्पतियों की लय की तरह, अब भालुओं के व्यवहार भी बदल रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ वन्यजीव का नहीं, बल्कि जलवायु का सच है, जिसे अनदेखा करना अब संभव नहीं। पहाड़ संकेत दे रहा है, खतरा सामने है और मुकाबले के लिए तैयारी समय रहते जरूरी है। पर्वतीय सीमांत गांवों की रातें पहले शांत थीं, आज सतर्क हैं और यह बदलाव जितना प्राकृतिक है, उतना ही गंभीर भी।

इस बदलते परिदृश्य में सबसे बड़ी चिंता यह है कि भविष्य के महीनों में यह संघर्ष और गहरा सकता है। जैसे–जैसे ठंड आगे बढ़ेगी और भोजन के प्राकृतिक स्रोत सीमित होंगे, भालुओं के अधिक आबादी वाले क्षेत्रों की ओर आने की आशंका बढ़ जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि शीतनिंद्रा न लेने से उनकी ऊर्जा खपत बढ़ती है, भोजन की तलाश लंबी होती है और इससे उनकी आक्रामकता और अप्रत्याशित व्यवहार और अधिक तीव्र हो सकता है। यह स्थिति केवल उत्तरकाशी तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि धीमे–धीमे गंगोत्री, हर्षिल, नैटवाड़, मोरी और यमुनोत्री क्षेत्र तक फैलने की संभावना है।

ग्रामीणों ने प्रशासन और वन विभाग से दीर्घकालिक और व्यवस्थित रणनीति बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि केवल अल्पकालिक समाधान से स्थिति नहीं संभलेगी, बल्कि संरक्षित मार्ग, घास चराई विकल्प, सुरक्षित लकड़ी–इंधन संग्रह ज़ोन, चेतावनी व्यवस्था और मुआवजा नीति को और मजबूत करना होगा। महिलाएं और बुजुर्ग सबसे अधिक जोखिम में हैं क्योंकि चारा, पानी, लकड़ी और पशुओं की देखभाल के लिए उन्हें ही अक्सर जंगल या गांव की बाहरी सीमाओं तक जाना पड़ता है। कई परिवारों ने बताया कि वे खेतों में निराई गुड़ाई का काम बंद करने पर मजबूर हैं, और कई ने पशुओं को जंगल छोड़ने के बजाय अब घरों में बांधना शुरू कर दिया है।

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पर्यावरण वैज्ञानिकों का मत है कि हिमालयी पारिस्थितिकी में हो रहे तेज परिवर्तनों की निगरानी और शोध की आवश्यकता अब अत्यावश्यक हो गई है। जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आवास का सिमटाव, मानव विस्तार और खाद्य शृंखला का टूटना भालुओं के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। यदि आने वाले वर्षों में यह प्रवृत्ति जारी रही तो मानव–वन्यजीव संघर्ष पहाड़ों की सबसे बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन सकता है।

पर्वतीय सीमांत गांवों की रातें पहले जैसी नहीं रहीं। छतों पर कदमों की आहट सुनाई दे तो पहले बर्फ, हवा या पत्तों के गिरने का खयाल आता था अब डर लगता है कि कहीं यह भालू न हो।

उत्तरकाशी के इन गांवों में आज डर है, सतर्कता है, प्रतीक्षा है और उम्मीद भी। उम्मीद इस बात की कि प्रशासन, विज्ञान और ग्रामीण अनुभव मिलकर समाधान खोजेंगे, ताकि भालू भी सुरक्षित रहें और इंसान भी। पहाड़ का जीवन संतुलन पर टिका है, और यह संघर्ष उसी संतुलन की परीक्षा है। यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती यह केवल शुरुआत है। आने वाले शीत महीनों में पहाड़ के व्यवहार और भालू की चाल दोनों पर नज़र रखना अब पहाड़ की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत है।

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