घी की खुरचन से बनेगी ‘बाल मिठाई’, वैज्ञानिकों ने विकसित की नई तकनीक
बरेली। अब तक डेयरियों और घरों में घी बनाने के बाद बचने वाली खुरचन (माइयर) को या तो पशुओं के चारे में मिला दिया जाता था या फिर फेंक दिया जाता था। लेकिन अब यही अवशेष ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की मिसाल बनकर बाजार में नई मिठास घोलने को तैयार है। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने घी की खुरचन से उत्तराखंड की प्रसिद्ध ‘बाल मिठाई’ का विकल्प तैयार कर लिया है।
संस्थान में प्रतिदिन करीब 2000 लीटर दूध का उत्पादन होता है, जिसमें से लगभग 1000 लीटर दूध की बिक्री की जाती है, जबकि शेष दूध से विभिन्न दुग्ध उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इस दिशा में अनुसंधान का कार्य पशुधन उत्पादन तकनीक (एलपीटी) विभाग द्वारा किया जा रहा है।
एलपीटी विभाग की प्रधान विज्ञानी डॉ. गीता चौहान के अनुसार, घी की खुरचन पौष्टिक होती है और इसका रंग भी बाल मिठाई जैसा भूरा होता है। इसी आधार पर इसे उपयोग में लाकर नई मिठाई विकसित करने का विचार आया। वैज्ञानिकों ने खुरचन को मशीन से सुखाकर पाउडर बनाया और उसमें 60 प्रतिशत खुरचन व 40 प्रतिशत खोया (मावा) मिलाकर, स्वादानुसार चीनी जोड़कर प्रयोग किया। तैयार उत्पाद का स्वाद पारंपरिक बाल मिठाई जैसा पाया गया।
प्रयोग के सफल होने के बाद इसे पैकेटबंद पाउडर के रूप में विकसित किया गया है। इस पाउडर को विशेष तकनीक से तैयार किया गया है, जिससे यह 4 से 5 महीने तक सुरक्षित रह सकता है। उपभोक्ता इसे पानी मिलाकर कुछ ही मिनटों में तैयार कर सकते हैं।
संस्थान ने इस तकनीक का पेटेंट भी करा लिया है और अब इसे व्यावसायिक उपयोग के लिए कंपनियों को उपलब्ध कराया जाएगा। इस नवाचार से डेयरी संचालकों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलेगा, साथ ही खोया की खपत भी कम होगी। अब तक बाल मिठाई पूरी तरह खोया से बनती थी, लेकिन नई तकनीक में केवल 40 प्रतिशत खोया की आवश्यकता होगी।
यह पहल न केवल अपशिष्ट के बेहतर उपयोग का उदाहरण है, बल्कि दुग्ध उद्योग में नवाचार और आर्थिक लाभ की नई संभावनाएं भी खोल रही है।




