मैं परसों फिर अपने #गांव_मोहनरी आया हूं। #जौनपुर के कुछ गांवों में जाने के बाद विशेष तौर पर गैड़ के खेतों को देखने व खेती के विषय में लोगों से बातचीत करने के बाद मैं अपने गांव में फिर उस मॉडल को तलाश रहा हूं जो हमारे जौनपुर-रंवाई घाटी के लोग अपने गांव में अपना रहे हैं।
मैं पिछले डेढ़ साल से इस प्रयास में लगा हूं। मैं राजनीति से हटकर के कुछ दिन जब अपनी जिंदगी की फिलॉसफी ढूंढने की कोशिश करता हूं तो मुझे उसमें अपना गांव ही नजर आता है और मैं चाहता हूं कि जिस समय तक मेरे हाथ-पांव चल रहे हैं मैं अपने गांव में अपने लिये यह मॉडल तैयार कर सकूं।


आख़िर #राजनीति से एक दिन सबको निवृत होना है। राजनीति हो, राजकीय सेवाएं या कोई दूसरा काम हो कभी न कभी धरती मां सबको बुलाती है और समय पर हम उसके बुलावे को स्वीकार करके आ जाएं तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिये कुछ करके भी जा सकते हैं। जिस तरीके से हमारे मां-बाप हमारे लिये बहुत कुछ करके गये उसी तरह हम भी कुछ करके जाएं। लेकिन मुझे कुछ चीजों का साॅल्यूशन मिल रहा है तो दो चीजों का साॅल्यूशन नहीं मिल पा रहा है। जो बड़ी क्रिटिकल हैं। एक तो लोगों की मानसिकता का साॅल्यूशन नहीं मिल पा रहा है और दूसरा जो गांव में ये दैत्य चीड़ घुस आया है इसका साॅल्यूसन नहीं मिल पा रहा है, इसके लिये मैंने “मेरा वृक्ष-मेरा धन योजना” प्रारंभ की थी, इसको किस तरीके से सस्टेन किया जाय यक्ष प्रश्न है
लेकिन मुझे लगता है कि यह लोगों की मानसिकता के ऊपर छा गया है।




