काफल का मौसम एक बार फिर आ गया। लेकिन इस बार यह मौसम स्थानीय लोगों के रोजगार का माध्यम भी नहीं बन पा रहा है।

नवल कोरोना वायरस कोविड-19 के वैश्विक संकट के चलते काफल से भरी टोकरियां लिए गांव के लोग बसों, कारों में सफर करने वाले मुसाफिरों को इस बार इसके स्वाद से वंचित रहेंगे।
पहाड़ में लघु आजीविका का साधना बना यह फल पर्यटन व्यवसाय के बंद रहने के चलते पूरी तरह से पटरी से उतर गया है जिसके चलते इस व्यवसाय से अपना जीवन यापन करने वाले लोग आज छोटे बीज युक्त फल स्वादिष्ट तथा जूस युक्त होने के कारण पसंद किये जाने वाले इस फल के गाहक नहीं मिल पाने से मायूस हैं। साथ ही इनकी आजीविका का संकट तेजी के साथ गहराता जा रहा है।

काफल व्यवसाय से जुड़े कारोबारियों का कहना है कि पर्वतीय अंचल के ग्रामीण जंगल से फलों को तोड़कर ग्रामवासी इन्हें बाजार तथा कस्बे में 80 से 100 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेच कर अपनी आजीविका चलाते हैं। प्रत्येक वर्ष एक पेड़ के फलों से 30 से 40 हजार रुपये आय हो जाती थी। इस प्रकार ग्राम वासियों के लिए यह अतिरिक्त आय का स्रोत भी था। लेकिन लॉक डाउन के कारण यह व्यवसाय पूरी तरह से बंद हो गया है।जिसके चलते इस व्यवसाय से जुड़े लोग काफी परेशान हैं।
जानकारों का कहना है कि यह फल को 4 या 5 दिन से ज्यादा नहीं रखा जा सकता, यह अत्यधिक रस युक्त होता है तथा इसके बाद सड़ने लगता है। इसका रंग चमकदार लाल होता है। फल के तुड़ाई के दौरान सबसे बड़ी समस्या यह है कि तोड़ने की अवधि बहुत ज्यादा होती है तथा एक पेड़ से कई चरणों में फलों की तुड़ाई होती है। यद्यपि जंगल में फलित अनेक पेड़ों से इस फल की तुड़ाई की लागत ही मूल्य वृद्धि का एक कारण है।

काफल के संबंध में गांवों में एक कथा प्रचलित है। यह बड़ी मार्मिक है। उत्तराखंड के एक गांव में एक गरीब महिला रहती थी, जिसकी एक छोटी सी बेटी थी। दोनों एक दूसरे का सहारा थे। आमदनी के लिए उस महिला के पास कुछ नहीं था। छोटी सी खेती बाड़ी थी। किसी तरह घर चल पाता था। गर्मियों में जैसे ही काफल पकते महिला व उसकी पुत्री प्रफुल्लित हो जाते। महिला जंगल से काफल तोड़ कर लाती और उनको बाज़ार में बेच कर आती।
एक बार वह जंगल गयी और वहां से एक टोकरी भर कर काफल तोड़ कर लायी। अभी सुबह का समय था। फिर उसे जानवरों के लिए चारा लेने जाना था। शाम को वह काफलों को बाजार में बेचने जाती। वह टोकरी लेकर आई और अपनी बेटी को बुला कर कहा- बेटी, मैं जंगल से चारा काट कर ला रही हूं। तब तक तू इन काफलों की पहरेदारी करना। जंगल से आ कर मैं तुझे भी कुछ काफल खाने को दे दूंगी…पर तब तक तू इन्हें खाना मत। छोटी सी लड़की उन काफलों की पहरेदारी करती रही। कई बार उसके मन में विचार आया कि कुछ काफल खा ले… पर मां ने कहा है जब तक लौट कर ना आ जाऊं, एक भी काफल मत खाना। लड़की अपनी जिह्वा पर काबू कर बैठी रही।
दिन में जब मां घर वापस आई तो टोकरी का एक तिहाई भाग कम था और लड़की टोकरी के पास बैठी सो रही थी। मां जो सुबह से काम में लगी थी और जो बेटी को बोल कर गयी थी की वापस आ कर कुछ काफल दूंगी, वह बेटी की इस धृष्टता पर गुस्से से भर गयी। उसने घास का गट्ठर एक ओर फेंका और सोती हुई लड़की की पीठ पर मुट्ठी से जोरदार प्रहार कर दिया। नींद में इंसान की शक्ति कम हो जाती है, उस समय वह अचेतन की अवस्था में होता है। मां के एक ही प्रहार से बेटी ढेर हो गयी। मां ने उसे हिलाया-डुलाया पर वह मर चुकी थी।
मां उसके पास बैठी रोती रही। शाम होते होते काफल की टोकरी फिर पूरी भर गयी। तब महिला को समझ आया की दिन की गर्मी के कारण काफल मुरझा जाते हैं और शाम को ठंडी हवा लगते ही फिर ताजे हो गए। अब मां को अपनी गलती का अहसास हुआ और अपनी पुत्री की मौत के सदमे से वह भी मर गयी।
कहा जाता है की उस दिन के बाद से एक चिड़िया चौत के महीने में ’काफल पाको मैं नि चाखो’ कहती है। जिसका अर्थ है कि काफल पक गए मैंने नहीं चखे। फिर एक दूसरी चिड़िया ’पुर्रे पुतई पुर्रे पुर’ कहती है। जिसका अर्थ है। पूरे हैं बेटी पूरे हैं।
काफल पेट रोगों के लिए चमत्कारी रूप से लाभ दायक है। यह हिमालयी क्षेत्रों में पाये जाने वाला सदाबहार वृक्ष है। यह 1300 मीटर से 2900 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पैदा होता है। काफल के पेड़ के तने की छाल भारतीय तंत्र में औषधि के रूप में प्रयोग की जाती है। आयुर्वेद चिकित्सक इसे गर्माहट, उत्तेजक तथा खून रोकने के उपयोग में तथा यूनानी चिकित्सा में यह टॉनिक तथा गैस की बीमारी के उपचार में उपयोग में लाया जाता है। तने की छाल का सार, अदरक तथा दालचीनी का मिश्रण अस्थमा, डायरिया, बुखार, टाइफाइड, पेचिश तथा फेफड़े की बीमारियों के लिए अत्यधिक उपयोगी है। छाल का पाउडर जुकाम, आँख की बीमारी तथा सरदर्द के उपचार में प्रयोग किया जाता है। सड़े हुए घावों के लिए भी यह उपयोगी है। दांत दर्द के लिए छाल तथा कान दर्द के लिए छाल का तेल अत्यधिक उपयोगी है।
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