देहरादून।
वरिष्ठ फिजिशियन डॉ एनएस बिष्ट ने कहा कि योगगुरु बाबा रामदेव की कर्मभूमि उत्तराखंड है, इसलिए उन्हें उत्तराखंड से ही जवाब मिलना चाहिए। पर उनके ज्यादातर सवाल जवाब देने लायक नहीं लगते।
उन्होंने कहा कि विज्ञान भावनात्मक नहीं होता। उसका कोई सगा या पराया नहीं होता। न कोई अपनी और न पराए की संस्कृति। यह सभी के लिए बराबर है।
-डॉक्टर भगवान नहीं, इंसान हैैं। वह भी किसी अन्य व्यक्ति की तरह फंगस, बैक्टीरिया या वायरस से संक्रमित हो सकते हैैं। स्वामी लोग जरूर ईश्वर पुरुष होते हैैं और वो शायद अमर भी रहें। पर डॉक्टर लोग कोरोना से जूझेंगे भी, मरेंगे भी और लोगों को जिंदा भी रखेंगे।
उन्होंने कहा कि उनकी इस प्रश्नावली पर आश्चर्य भी है। कोरोनाकाल में क्या बाबा को भक्तों की कमी हो गई है, जो उन्होंने चिकित्सकों के बीच घुसपैठ कर दी। शायद वह यही चाह रहे हैैं कि डॉक्टर उनकी चर्चा करें। धनबल, लोकप्रियता आदि में वह बेशक हमसे काफी आगे हैैं। लेकिन इस तरह की घुसपैठ का कोई फायदा उन्हें नहीं होने वाला। क्योंकि डॉक्टर बहुत स्वार्थी होते हैैं। पहला स्वार्थ पेशे का और दूसरा मरीजों का। डॉक्टरों के पास समय का कमी है और बाबा रामदेव के लिए भी यही स्थिति लागू होती है। वह थोड़ा भावुक भी होते हैैं। एकाध दिन गुस्सा होंगे और शायद फिर सब भूल भी जाएंगे। आप आगे ऐसी कोई बात करेंगे तो वह वापस आपकी तरफ पलटकर नहीं देखेंगे। कुछ डॉक्टर यदि आपको मानते भी होंगे तो वह अब आपकी ओर ध्यान नहीं देंगे।
-जैसा बाबा एलोपैथिक चिकित्सकों से पूछ रहे हैैं, क्या क्रोध, हिंसा व हैवानियत का आयुर्वेद में कोई उपचार है। यदि है तो जो जुबानी हिंसा उन्होंने चिकित्सकों के प्रति दिखायी है, उक्त दवा का प्रयोग उन्हें स्वयं पर करना चाहिए।
-जो चीज बदलाव के साथ बदलती रहती है वही विज्ञान है। पर्यावरण बदल रहा है, जीवाणु-विषाणु बदल रहे हैैं, रोग बदल रहे हैैं और उनका इलाज बदल रहा है।
-मैैं किसी भी आयुर्वेदाचार्य से खुली बहस को तैयार हूं वह भी संस्कृत में। जिन बीमारियों के स्थाई समाधान की बात बाबा कर रहे हैैं, यदि वह सही और प्रमाणिक है तो उन्हें नोबेल पुरस्कार और विश्व के प्रथम नागरिक का दर्जा मिलना चाहिए।
-ऑक्सीजन सिलेंडर के बिना ऑक्सीजन बढ़ाने उपाय उन्होंने खोजे हैैं। चांद व मंगल ग्रह पर कॉलोनी बनाने की जो बात की जा रही है, तो क्यों न वहां स्वामी जी की मदद ली जाए।




