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ग्राउंड जीरो से रिपोर्ट-: पहाड़ की इस ‘मां’ से सीखिए! बच्चों को पढानें की उम्र में खुद जलाई शिक्षा की मशाल, 12 वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करके बनी प्रेरणास्रोत.. ग्राउंड जीरो से संजय चौहान।

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पहाड़ की इस ‘मां’ से सीखिए!– बच्चों को पढानें की उम्र में खुद जलाई शिक्षा की मशाल, 12 वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करके बनी प्रेरणास्रोत..
ग्राउंड जीरो से संजय चौहान।

चमोली
कोरोना काल का सबसे ज्यादा खामियाजा स्कूल के छात्र छात्राओं को उठाना पडा। कोरोना काल इनके लिए दुःस्वप्न साबित हुआ। वहीं आज उत्तराखंड बोर्ड की दसवीं और 12 वीं की परीक्षा के नतीजे घोषित किये गये।

पढ़ने-लिखने की कोई उम्र सीमा नही होती है। कुछ कर गुजरने की इच्छा और साहस के दम पर इंसान किसी भी उम्र में अपने कदम पढ़ाई के लिए बढ़ा सकता। आज आये उत्तराखण्ड की बोर्ड परीक्षा परिणामों में इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है ठेट पहाड़ की कमला रावत नें जिन्होनें अधूरी पढ़ाई को 17 साल बाद दुबारा शुरू करके पहले 10 वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की और आज 12 वीं की परीक्षा पास करके लोगों के लिए मिशाल बन गयी है। सीमांत जनपद चमोली के दशोली ब्लाॅक के ठेल्ली गांव निवासी कमला रावत नें सही मायनों में बेटी बचाओ, बेटी पढाओ के स्लोगन को हकीकत में बदल कर दिखा दिया है कि पहाड़ की बेटियों का जीवन केवल चूल्हा चौका, खेत खलिहान और कुदाल दरांती तक ही सीमित नहीं है अगर वो ठान ले तो आखर और कलम से अपनी तकदीर खुद लिख सकती है। कमला रावत की एक बेटी 10 वीं में, एक बेटा 8 वीं में और दूसरा बेटा 5 वीं में है और वह खुद नंद्रप्रयाग से इस साल 12 वीं की परीक्षा पास करके पहाड़ की बेटियों के लिए नये प्रतिमान स्थापित कर गयी है।

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बेहद अभावों और संघर्षो से भरा रहा जीवन..

कमला रावत का जीवन बेहद संघर्षमय रहा। बेहद सामान्य परिवार से ताल्लुक रखनें वाली कमला नें बेहद गरीबी और घर से स्कूल दूर होने के कारण मजबूरी में कक्षा 8 की पढाई के बाद आगे की पढाई छोड थी जबकि कमला के अन्य सभी सहपाठियों ने आगे की पढ़ाई जारी रखी। कमला आगे तो पढ़ना चाहती थी पर गरीबी और परिस्थितियों के आगे कमला चाहकर भी आगे की पढाई नहीं कर पाई, इस बात का कमला को आज भी बहुत अफसोस होता है। समय बीतता गया और कमला की शादी भी हो गई। ससुराल में गृहस्थी की जिम्मेदारी संभाली और वो अपने बच्चों के लालन पालन में व्यस्त हो गयी। जब कमला अपने बच्चों को स्कूल जाते और पढ़ाई करते हुये देखती थी तो उसको अपनी अधूरी पढ़ाई की टीस हमेशा कचोटती रहती थी।

शिक्षिका और परिवार से मिला प्रोत्साहन !

कमला रावत कहती है कि मायके में अभावों में जीवन बीता तो ससुराल में परिवार कीसारी जिम्मेदारी निभानी होती है। इसलिए कभी अपने लिए सोचने का समय ही नहीं मिला।कुछ वर्ष पहले ही हमारे गांव में प्राथमिक विद्यालय मैड ठेली में एक शिक्षक की कमी थी ग्राम प्रधान एवं सभी ग्रामीणों की आपसी सहमति से कुछ महीने मैंने वहां पर बच्चों को पढ़ाया उसी दौरान विद्यालय की प्रधानाअध्यापिका जी से बात हुई क्योंकि उनको भी विश्वास नहीं था कि मैं आठवीं पास थी तब उन्होंने मुझे आगे पढ़ने का सुझाव दिया जो मेरे लिये असंभव भी था मन में पढ़ने की इच्छा भी थी। इसी बीच मेरे बच्चे भी काफी बड़े हो गए थे, मेरे बच्चे उस समय खुद छठवीं आठवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। इसलिए मैने आगे पढने की बात अपने परिवार के संग साझा की तो वो सभी बेहद खुश हुए और सबने मुझे अधूरी पढ़ाई को पूरी करनें और आगे पढाई जारी रखनें को प्रोत्साहित भी किया। कहती है कि जीवन में सबसे बड़ी ख़ुशी उस काम को करने में है, जिसे लोग कहते हैं, कि ये तुम्हारे बस का नहीं है.. बस इसी बात को मन में गांठ की तरह बाँध ली थी फिर 17 साल की अधूरी पढ़ाई पूरी करते हुये पहले हाईस्कूल की परीक्षा पास की और आज 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करनें के बाद मैं बहुत खुश हूँ आखिरकार वर्षों पहले देखा मेरा सपना साकार हुआ है। मैं चाहती हूं कि कोई भी शिक्षा से वंचित न रहे खासतौर पर बेटियां चाहे परिस्थितियां कुछ भी हो। यदि भविष्य में संभव हो पाया और मां भगवती की कृपा रही तो जीवन का यह संघर्ष जात्रा लघु फिल्म के माध्यम से भी लोगों के सामने लाने की कोशिश रहेगी।

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सामाजिक कार्यों और लोगों को जागरूक करने में हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहती है कमला रावत..

भले ही 5 साल पहले तक कमला खुद को अनपढ समझती हो लेकिन उसने अपने कार्यों से लोगों को ये आभास ही नहीं होने दिया था की वो इतनी कम पढी लिखी है। वो हमेशा से ही सामाजिक कार्यों.. स्वच्छता, गांव की समस्याओं, बेटी बचाओ बेटी पढाओ, के स्लोगनों को धरातल पर क्रियान्वित करने में बढ चढकर हिस्सा लेती है। गांव की सांस्कृतिक विरासत हो या अन्य सबको बखूबी निर्वहन करती। माँ नंदा के लोकगीतों और जागरों को संजोना हो या फिर हरेला के पारम्परिक त्यौहारों को मनाना ये भला कोई कमला रावत से सीखें। डिजिटल प्लेटफॉर्म में कैसे अपनी बात रखनी है ये भी कमला रावत से सीखा जा सकता है।

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ढूँढोगे अगर तो ही रास्ते मिलेंगे….
मंज़िलो की फ़ितरत है ख़ुद चलकर नहीं आती है उक्त पंक्तियों को सार्थक कर दिखाया है कमला रावत नें.
पहाड़ की इस मां को हजारों हजार सैल्यूट..

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